उत्तर प्रदेश, स्वनाम धन्य भारत वर्ष का संस्कृति केन्द्र रहा है। इस भूक्षेत्र की पावन धरा पर जन्म लेने के लिए देवता भी लालायित रहे हैं। यहाँ के अन्य क्षेत्र में अवतरण का सुखानुभव करके ने कंवल श्री विष्णु मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाते है, वरन मथुरा में जन्म लेकर विष्णु अवतारी श्री कृष्ण लीला पुरूष रूप में सम्पूज्य रहे हैं। समय चक्र कालान्तर में सम्भवतः अवतारों में विश्वास न करता हुआ सामान्य मानव से असाध्य महतकर्म रूपी अपना प्रयोजन महामानवों के अवलम्बन से सिद्ध करने लगा, अतएव समय चक्र, संचालक विधाता की दृष्टि जब जब जन मानस पावनी जनपद मुख्यालय से लगभग 4.5 Kmपश्चिम में बसे परासीपाण्डेय गाँव पर पड़ी तो उसने इस गाँव से एक युग पुरुष द्वारा लिखे जाने वाले अविस्मरणीय इतिहास की कल्पना कर डाली। विधाता के इसी कल्पना के साकार स्वरूप के प्रथम अध्याय के रूप में श्री तिलकधारी देव पाण्डेय के पुत्र के रूप में श्री हरिकृष्ण देव पाण्डेय जी का जन्म 1938 ई० हुआ। पाण्डेय जी का परिवार पूर्णतः कृषि व आचार्यी पर अवलम्बित था। पिताजी ने बालक को शिक्षा दिलाने का पूर्ण प्रयास किया तयापि आप अधिक पढ़-लिख न सके, क्योंकि विधाता आपसे कुछ और सम्पन्न कराना चाहता था। उत्तरदायित्वों का स्थानान्तरण प्रकृति का अनिवार्य पक्ष रहा है, इसी अनिवार्यता के परिणाम स्वरूप आपके ऊपर पारिवारिक दायित्वों का भार आ पड़ा। आपको पिता से मिले मूलमन्त्र परिश्रम एवं कर्मठता से पर्याप्त सम्बल मिला था आप जीवन के पथपर सफलता पूर्वक चलते रहे। आपके कर्म स्थलों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के अधिकांश जनपदों में सम्पनन आपके सदकर्म आपकी कर्तव्य निष्ठा एवं दृढ़ संकल्प भावना के उदाहरण है। आप धार्मिक, सामाजिक एवं जीवन के नैतिक पक्ष के समर्थक रहे हैं। आपने सन् 1998 में गुरूकुल विद्या मन्दिर का निर्माण कराया तथा शिक्षा की महत्ता को समझते हुए सन् 2010 में गुरूकल विद्यामन्दिर एवं इण्टर कॉलेज का निर्माण करवाकर माध्यमिक शिक्षा की ज्योति का प्रकाश फैलाकर अपनी सुदृष्टि का परिचय दिया। आप इस क्षेत्र में अभी और महानकार्य सम्पन्न करना चाहते थे जिनसे सुविधा सम्पन्न अस्पताल तथा अन्य शिक्षा केन्द्र प्रमुख थे तथापि आपके सदउद्देश्य की पूर्णता का सूत्र आपके समर्थ वंशधरों के कर में न्यस्त कर विधाता ने ……………………………….. को आपको परम शान्ति अर्पित की। आपके सपने आपके उत्तराधिकारी वंशधरों की कल्पना से मूर्तित हो रहे हैं।
“परिवर्तिनि संसारे, मृतः को वा न जायते ।
सजातो येन जातेन, याति वंशः समुन्नतिम् ॥
कारणस्यापि कारणं, यत् येन वंशः शुक्लायते।
तस्मै पितृ परेशाय, अक्षराय नमाम्यहम्